एक भी कतरा कभी खूनका , क्या कभी बोले ?
इस जात में ,न बसु न बहु ,न इस बिरदारीमे !
माँ का दूध कभी न सोचे कि पोषु ही लाल गोरे
कठपूतली कुदरतकी हम ,क्यों उल्टा ही सोचे ?
हम चाहे, तलसे उसे ,जिसने सुकून ही सब छीने
फिर "सुकून नहीं यहाँ" शिकायते जारी रखे !
हर वख्त दिखे उबाल यहाँ और हर बात में अंगारे
"कैसे जिए"सिखाया है तो बहोत बड़े विद्यालयने !
अर्चिता दीपक
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