Wednesday, 26 August 2015

Kaise jiye

एक भी कतरा कभी खूनका , क्या कभी बोले ?

इस जात में ,न बसु न बहु  ,न इस बिरदारीमे !

माँ का दूध कभी न सोचे कि पोषु ही लाल गोरे

कठपूतली कुदरतकी हम ,क्यों उल्टा ही सोचे ?

हम चाहे, तलसे उसे ,जिसने सुकून ही सब छीने

फिर  "सुकून नहीं यहाँ" शिकायते  जारी रखे !

हर वख्त दिखे उबाल यहाँ और हर बात में अंगारे

"कैसे जिए"सिखाया है तो बहोत बड़े विद्यालयने !
                                             अर्चिता दीपक

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