तड़पाहट थी , छपछपाहट सी थी तब हर रगमे ,
हुआ दीदार -ए -यार तो सुकून दौड़ रहा है खूनमे ...
नहीं आते तो न थी वजह कोई उनको बुलाने की
सांसे तो रुक जाती हमारी कैसे रहती ज़िन्दगीभी ...
कैसे जी पाते हमे न था यकीं न दिल पे न अपनेपे
शुक्र करें तो भी किनका मिल्कियत सब है उन्हीकी ..
रब सा चाहू हूँ सनम तुज़े या तुज़ सा है रब मेरे लिए
मसलत मुसलसल चलती है मेरे दिलमे और जहनमे ...
अर्चिता दीपक
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