न जाने क्यू अब भी याद है वो मोड़
जहाँ मिले थे .... हम थे
तुम भी थे ....
जज़्बातोके भंवरमे हम डूबे थे
तुम भी डूबे थे ....
डुबाकर उठाने वाले वो लम्हे थे
तुम थे ऊपर उठे
हम भी तो थे
न मांगकर कुछ बस देना था उधर
जज़्बातसे तो बस हमें अपने आप को
भिगोना था
न तुम कुछ बोले
न हम भी तो कुछ बोले थे ...
न कोई था बंधन फिर भी ...
हम उधर थे बंधे
आप भी तो थे बंधे .....
आज भी उस मोड़ से उसी तरह है जुड़े ...
बहुतसे अनजानों में है कुछ पहचाना सा ...
हम है ही वहां
जहां आप भी तो है वहां ...
~अर्चिता दीपक
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