माँ .....
इस संसार में एक साधारण स्त्री का
रूप लिए तुम क्यू सहमी सी लगती हो ?
क्यू अपने विचार
प्रदर्शित करने से डरती हो ?
क्यू अपना निर्णय
जाहिर करने पर ज़ीज़कती हो ?
अपनी पसंद को अंतिम एहमियत
देती हो ?
एहतराम सबको देते देते
क्या खुद अपना संभाल सकती हो ?
माँ.....
तुम हर रूपमे जीता करो ....
अपना सम्मान बनाये रखो ....
इस धरती पर भी
तुम्हारे बिना है सब....
पर अधूरा है ....
बस,
तुम अपने मृदु स्पर्शसे
कठोर जीवनको
जिवंत बनाओ....
सुखी बनादो ....
कृपा बनाये रखो ....
अर्चिता दीपक
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