चलनमें नहीं है
इस बटवेके
कोईभी सिक्के
फिरभी
हर एक सिक्का
एक गरिमा लिये
सीना तानके बैठा है
बंद तिजोरीमें
विशिष्ट छाप लिये
हर साल
लक्ष्मी पूजनके दिन
मैं पूजता हूं इन्हें
क्यूं कि
ये कभी मेरे दादाजीकी जेब के
साथी रहे होंगे...
कुछ उल्ट सुलट हालात
देखे होंगे...
छूता हूं
मैं जब उन्हें
एक सुकुन मिलता है
पुरखों के आशीर्वाद का..
यहां आशीर्वाद का चलन है...
वो ही हमें जीताता है
हर जंगमें...
हर मायुसीमें...
©अर्चियत
No comments:
Post a Comment